पटना: भीषण गर्मी और बारिश सामान्य रूप से नहीं होने से भूजल स्तर घटता जा रहा है। अप्रैल के दूसरे सप्ताह में ही सोन और पुनपुन की ऊपरी सतह पर पानी सूख जाने के कारण स्थिति अभी से ही खराब होने लगी है। इससे आसपास के इलाके में चापाकल और भूजल के प्रथम लेयर में लगी बोरिंग सूखने लगे हैं।
15 दिन पहले से पड़ रही भीषण गर्मी ने स्थिति को और भयावह कर दिया है। पटना सिटी से लेकर पुनपुन और सोन के इलाके में भूजल का पहला लेयर अभी ही चार से पांच फीट नीचे चला गया है। अगर हम लगातार यूं ही पानी का दोहन करते रहे, तो स्थिति ज्यादा खराब हो सकती है। अभी सोन के किनारे मौजूद बिहटा, कोईलवर, परेव आदि गांवों के कई चापाकलों ने पानी फेंकना छोड़ दिया है। यही स्थिति पुनपुन के किनारे स्थित गांवों व टोलों की भी है।
लगातार बढ़ रही जनसंख्या, सामान्य से अधिक हो रहा दोहन
पटना शहरी और ग्रामीण इलाकों में जनसंख्या लगातार बढ़ रही है। इससे भूगर्भ जल का दोहन भी लगातार हो रहा है। पटना शहर की आबादी 1971 से 2011 के बीच साढ़े छह लाख से बढ़कर सवा 22 लाख हो गई है। पहले जहां लोग कुआं और सार्वजनिक बोरिंग पर निर्भर थे, अब हर घर में समरसेबल पंप ने दोहन को दस गुना तक बढ़ा दिया है। अभी पटना नगर निगम क्षेत्र में दो से ढाई लाख घरों में लोगों ने समरसेबल करा रखा है।
चार से पांच मीटर नीचे चला गया है भूगर्भ जलस्तर
केंद्रीय भू जल बोर्ड के वैज्ञानिक बताते हैं कि पटना में गर्मी के दिनों में तीन से पांच मीटर पानी ऊपर-नीचे आता-जाता है। इसकी मुख्य वजह गर्मी के साथ पिछली बारिश पूर्ण रूप से एक्यूफर का रिचार्ज नहीं होना होता है। हालांकि वैज्ञानिक बताते हैं कि पटना के नीचे स्थित जलोढ़ पानी की कमी नहीं है। अगर लोग अब भी जल का दोहन असामान्य तरीके से करना बंद कर दें और बारिश होती रहे, तो लंबे समय पर भूजल की कमी नहीं होगी। इसके लिए रेन वाटर हार्वेस्टिंग को भी अनिवार्य करना होगा।
क्यों फेल हो जा रहा है पंप
पटना और आसपास के इलाके में तीन स्तरों पर जलोढ़ मौजूद है। इसमें पहला 30 से 60 मीटर की मिश्रित मिट्टी है, जिसमें जलोढ़ भी है और सामान्य मिट्टी है। सामान्य बोरिंग और हैंडपंप इसी लेयर पर लगाए गए हैं, जो गर्मी के दिनों में सूख रहे हैं। इसी लेयर का घटना बढ़ना बारिश के पानी पर ज्यादा निर्भर करता है। उसके बाद दूसरा पूर्ण जलोढ़ का लेयर 120 मीटर नीचे तक होता है। आर्सेनिक इलाकों को छोड़ दिया जाए, तो घरों में तीन सौ फीट तक जाने वाले आधुनिक समरसेबल पंप इसी लेयर में रहते हैं, जो सूखते तो नहीं, लेकिन गर्मी बढ़ने और दोहन अधिक होने पर क्षमता कम जाती है और लेयर घटने लगता है। इसके बाद तीसरा लेयर 120 मीटर से 220 मीटर से भी अधिक रहता है, जिसमें सामान्यतः पानी नहीं घटता है। लेकिन, यहां बोरिंग करना सामान्य बजट की बात नहीं है।
जलोढ़ गंगा नहीं, सोन से प्रभावित होता है
पटना तीन तरफ से नदियों से घिरा हुआ इलाका है। इसमें गंगा, सोन और पुनपुन नदिया हैं। केंद्रीय भूमिजल बोर्ड के वैज्ञानिक बताते हैं कि तीनों नदियों का निचला स्तर जलोढ़ से मिलता है। गर्मी के दिनों में अगर सोन और पुनपुन में पानी होता है, तो जलोढ़ रिचार्ज होते रहता है। वहीं इसके विपरीत गंगा नदी में पानी नहीं होने से वह खुद को जलोढ़ से ही रिचार्ज करती है।
5% दोहन बढ़ा तो पानी तीन फीट नीचे जाएगा
केंद्रीय भूमि जल बोर्ड के वैज्ञानिकों की मानें तो वर्तमान भूजल का दोहन में अगर पांच फीसदी सालाना वृद्धि होती है, तो वर्ष 2018 तक 1.25 मीटर से अधिक यानी साढ़े तीन फीट की स्थायी रूप से हो कमी हो जाएगी। वैज्ञानिकों ने इसे कंकड़बाग और सर्किट हाउस के सेमुलेटेड व हाइड्रोग्राफ के अध्ययन से पता लगाया गया है।
क्यों नहीं हो पाता जलोढ़ रिचार्ज
जलोढ़ को रिचार्ज होने का मुख्य स्रोत होता है बारिश का जल। राज्य में सालाना औसतन 1027 मिलीमीटर बारिश होती है। बारिश का समय दो माह का होता है। लेकिन, क्लाइमेट में आए बदलाव के कारण असामान्य रूप दो माह पानी दस दिनों में ही गिर जाता है, जिसे मिट्टी अवशोषित नहीं कर पाती और पानी जलोढ़ में जाने के बजाए बह जाता है। यही कारण है कि जलोढ़ ठीक से रिचार्ज नहीं हो पाता है। केंद्रीय भूगर्भ जल बोर्ड के वैज्ञानिकों की मानें, तो तीन से चार फूट जलोढ़ में हर साल तीन से चार फीट पानी की कमी आ रही है।
Source: Bhaskar

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