मुजफ्फरपुर: आमतौर पर चमगादड़ों का वास वीरान खंडहरों और गुफाओं में होता है, लेकिन छपरा मेघ गांव में ये पेड़ों की डालियों पर फलों की तरह लटकते मिलते हैं। वह भी एक-दो या दर्जन भर नहीं, बल्कि हजारों की संख्या में। हर डाली पर 10-20 चमगादड़ों का झुंड देखने देश-विदेश तक के सैलानी आते हैं। लेकिन, यहां के ग्रामीणों के लिए यह कौतूहल का विषय नहीं है।जानिए, किनके लिए शुभ हैं चमगादड़...
- शहर से 10 किमी. पूर्व मुशहरी प्रखंड का छपरा मेघ गांव वर्षों से इन चमगादड़ों के चलते विख्यात है।
- लोग इस गांव को बादुर यानी चमगादड़ छपरा के नाम से भी पुकारते हैं।
- हालांकि किसी को ठीक-ठीक मालूम नहीं है कि ये चमगादड़ एक ही स्थान पर कब से और क्यों आसरा लिए हुए हैं।
- बहरहाल इस क्षेत्र में भारी संख्या में चमगादड़ों की मौजूदगी बाहरी लोगों के मन में कौतूहल पैदा करता है।
- यही कारण है कि मेला लगने के समय यहां काफी संख्या में पर्यटक आते हैं।
गांववालों का क्या है कहना
- कुछ ग्रामीणों का कहना है कि दो सौ साल पहले यहां एक सिद्ध पुरुष महंत बालादास रहते थे।
- उन्होंने राम, जानकी और हनुमान का मंदिर बनवाया था।
- इसी मंदिर के अहाते में स्थित बगीचे के खीरी के पेड़ों पर चमगादड़ों ने आसरा जमा लिया।
- तब से गांव में कई बदलाव आए। आस-पास घनी आबादी बस गई।
- राम-जानकी की ठाकुरबाड़ी सहित बाबा दूधनाथ मंदिर का कायाकल्प हुआ। मेले लगने लगे।
- लेकिन, चमगादड़ों का आशियाना बरकरार रहा।
क्या कहते हैं पुजारी
- राम-जानकी ठाकुरबाड़ी के कर्ता-धर्ता शंकर प्रसाद सिंह कहते हैं- यह शुभ माना जाता है।
- 25 हजार की आबादी वाले छपरा मेघ पर कभी संकट नहीं आया। सभी लोग यहां सुखी-संपन्न हैं।
- इनकी मानें तो 16वीं शताब्दी से ही ठाकुरजी का मंदिर था। तभी से चमगादड़ भी हैं।
- महंत बालादास देख-रेख करते थे। ठाकुरबाड़ी के सामने तालाब खुदवाने लगे, तो शिवलिंग निकला।
- इसमें से दूध की धारा निकलने के कारण ही बाबा दूधनाथ धाम नाम पड़ गया।
- यह मंदिर बाबा गरीबनाथ धाम और चतुर्भुज स्थान मंदिर से पुराना माना जाता है।
मोतिहारी में भी जुटते हैं लोग
तिरहुत प्रमंडल में चमगादड़ों के झुंड को देखने दूर-दराज से सैलानी जुटते हैं। मोतिहारी में चिरैया प्रखंड के भलबइया में पेड़ों पर चमगादड़ों का डेरा लोगों को खूब लुभाता है।
पर्यटन स्थल के विकास की आस अधूरी बना था 2.84 करोड़ का प्राक्कलन
ठाकुरबाड़ी के महंत ने बताया कि इस स्थल को पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित किया जाना था। सरकार के निर्देश पर जिला प्रशासन ने 2.84 करोड़ का प्राक्कलन बनाकर पर्यटन विभाग को भेजा। इससे तालाब का जीर्णोद्धार और घाट बनाया जाना था। मंदिर के सामने पार्क, फव्वारे और बगल में विवाह भवन, अतिथिशाला आदि का निर्माण होना था। नाप-जोख भी हुआ, पर हुआ कुछ नहीं।
बिहार यूनिवर्सिटी के शोष विशेषज्ञ प्रोफेसर एलएन शुक्ला का कहना है कि चमगादड़ों का निवास वीरान स्थानों पर होता है, जहां वे सुरक्षित रह सकें। शुरुआत में मंदिर के समीप पेड़ों पर आसरा हुआ होगा। धार्मिक स्थल होने के कारण लोगों द्वारा नुकसान नहीं पहुंचाने से इसकी संख्या बढ़ती चली गई। खुद को सुरक्षित महसूस करने एवं फलों के रूप में भोजन मिल जाने की वजह से ही अब तक आसरा बना हुआ है।
यह भी जानें
- 1000 से ज्यादा प्रजातियां पाई जाती हैं दुनियाभर में चमगादड़ों की।
- 1200 ग्राम तक होता है चमगादड़ का वजन, कम से कम 2 ग्राम।
- फलभक्षी और कीटभक्षी दो तरह के होते हैं चमगादड़।
- 1200 ग्राम तक होता है चमगादड़ का वजन, कम से कम 2 ग्राम।
- फलभक्षी और कीटभक्षी दो तरह के होते हैं चमगादड़।
Source: Bhaskar

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